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शैक्षणिक रैंकिंग प्रणालियों में पारदर्शिता क्यों महत्वपूर्ण है
आज के वैश्विक उच्च शिक्षा परिदृश्य में शैक्षणिक रैंकिंग प्रणालियाँ पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी हैं। विद्यार्थी विश्वविद्यालय चुनते समय इन्हें देखते हैं, अभिभावक इनके आधार पर किसी संस्था की गुणवत्ता को समझने की कोशिश करते हैं, और विश्वविद्यालय स्वयं भी अपनी प्रगति, अपनी पहचान तथा अपनी शैक्षणिक ताकतों को मापने के लिए इनका उपयोग करते हैं। इसके अलावा नियोक्ता, शोधकर्ता, नीति-निर्माता और अंतरराष्ट्रीय साझेदार भी रैंकिंग को ध्यान से देखते हैं, क्योंकि इससे किसी विश्वविद्या


अंकों से आगे: विश्वविद्यालय रैंकिंग क्या पूरी तरह नहीं माप सकती
हर वर्ष जब विश्वविद्यालयों की रैंकिंग सामने आती है, तो छात्र, अभिभावक, शिक्षक, शोधकर्ता और नियोक्ता बड़ी रुचि से उन्हें देखते हैं। यह स्वाभाविक है, क्योंकि रैंकिंग एक तेज़ और सरल तस्वीर देती है। लोग समझना चाहते हैं कि कौन-सी संस्था कितनी प्रसिद्ध है, कहाँ शोध अधिक हो रहा है, कहाँ अंतरराष्ट्रीय माहौल है, और कौन-सी जगह पढ़ाई के लिए अधिक आकर्षक दिखाई देती है। लेकिन क्यू आर एन डब्ल्यू को अक्सर एक महत्वपूर्ण प्रश्न प्राप्त होता है: क्या किसी विश्वविद्यालय की वास्तविक गुणवत्ता को


विश्वविद्यालय रैंकिंग छात्रों की पसंद और संस्थानों की प्रतिष्ठा को कैसे प्रभावित करती है
यह सवाल आज बहुत आम है: क्या विश्वविद्यालयों की रैंकिंग वास्तव में किसी छात्र के निर्णय को प्रभावित करती है?सीधा जवाब है—हाँ, काफी हद तक करती है। लेकिन पूरी तरह उसी पर निर्भर होना समझदारी नहीं है। आज उच्च शिक्षा की दुनिया पहले से कहीं अधिक बड़ी, विविध और प्रतिस्पर्धी हो चुकी है। छात्रों के सामने देश, शहर, अध्ययन-पद्धति, शुल्क, विषय, शिक्षण शैली और करियर के अनेक विकल्प होते हैं। ऐसे में अधिकतर छात्र और उनके परिवार किसी ऐसे संकेत की तलाश करते हैं जो उन्हें जल्दी से यह समझने में
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